मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है, जानें धर्मशास्त्रों के विचार

मन के विषय में धर्मशास्त्रों से लेकर अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं, मन ही बंधन मुक्ति या मोक्ष का कारण बनता है। मन को साध लेने से किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त की जा सकती है। मन ही परिस्थितियों का निर्माण कर सुख-दुःख की संरचना करता है। जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित नहीं रख पाते हैं, वे सफलता से दूर होते चले जाते हैं। आइए जानें मन के विषय में महापुरुषों के विचार।
ब्रह्माण्ड के गूढ़ रहस्य एवं गहराइयां मनुष्य के अंतर्मन में निहित हैं। मन ही परिस्थितियों का निर्माण कर सुख-दुःख की संरचना करता है। जीवन में प्राप्त होने वाली सफलता या असफलता, मानव मन पर निर्भर है। सृष्टि के नियम और मन का विज्ञान जानकर व्यक्ति किसी भी प्रकार की उन्नति कर सकता है, महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकता है। यह पूरा ब्रह्माण्ड एक कल्पवृक्ष है, जो हमारे भावों के अनुरूप सृष्टि का निर्माण करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, मन बहुत चंचल है, मनुष्य को मथ डालता है। जैसे वायु को दबाना बहुत कठिन है, वैसे ही मन को वश में करना भी अत्यंत कठिन है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि मन लाडले बच्चे के समान है। जैसे लाडला बच्चा सदैव अतृप्त रहता है, उसी तरह हमारा मन भी अतृप्त रहता है, अतएव मन का लाड़ कम करके उसे दबाकर रखना चाहिए। धम्मपद के अनुसार जैसे कच्ची छत में पानी भरता है, वैसे ही अविवेकी मन में कामनाएं धंसती हैं।
शेक्सपियर के अनुसार, मन को हर्ष और उल्लासमय बनाओ, इससे हजारों हानियों से बचोगे और लम्बी उम्र पाओगे। मनुस्मृति के अनुसार आकार, इंगित, गति, चेष्टा, वाणी एवं नेत्र और मुख के बदलते हुए भावों से मन के विचारों का पता लग जाता है। ज्योतिष शास्त्र में ज्योतिषी जन्मपत्री और ग्रहदशा के साथ व्यक्ति के मन की स्थिति को समझकर उसके भविष्य की व्याख्या करता है। रामकृष्ण परमहंस कहते हैं, जब तक मन अस्थिर और चंचल है, तब तक अच्छा गुरु और साधु संगति मिल जाने पर भी व्यक्ति को कोई लाभ नहीं होता। आदिगुरु शंकराचार्य के अनुसार जिसने मन को जीत लिया, उसने जगत को जीत लिया।
विनोबा भावे कहते हैं, जब तक मन नहीं जीत जाता और राग-द्वेष शांत नहीं होते, तब तक मनुष्य इंद्रियों का गुलाम बना रहता है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक मन में काम, क्रोध, मद और लोभ रहता है, तब तक ज्ञानी और अज्ञानी एक समान होते हैं। नीति शास्त्र के अनुसार मनुष्य का मन ही समूचा मनुष्य है।





