लखनऊ में क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन (उत्तर क्षेत्र) के शुभारंभ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

लखनऊ.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को लखनऊ में क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन (उत्तर क्षेत्र) के शुभारंभ कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश कृषि उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। यह बदलाव वैज्ञानिक तकनीकों, एग्रो-क्लाइमेटिक जोन आधारित रणनीति तथा केंद्र-राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों का परिणाम है। यूपी में “लैब टू लैंड” की अवधारणा धरातल पर उतर चुकी है, जिससे किसानों को सीधे लाभ मिल रहा है। कृषि विकास दर में उल्लेखनीय वृद्धि, प्रति हेक्टेयर उत्पादन में रिकॉर्ड सुधार, बहुफसली खेती का विस्तार और वैल्यू एडिशन पर बढ़ता फोकस इस परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। मुख्यमंत्री ने क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों, अंतरराष्ट्रीय कृषि केंद्रों की स्थापना, कृषि विज्ञान केंद्रों के सशक्तीकरण और प्रगतिशील किसानों की भूमिका को इस बदलाव का प्रमुख आधार बताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश आज देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
भिन्न-भिन्न एग्रो-क्लाइमेटिक जोन के अनुरूप बनें नीतियां
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न एग्रो-क्लाइमेटिक जोन होने के कारण नीतियां भी उसी अनुरूप तय की जानी चाहिए। यदि अलग-अलग जोन में इस प्रकार की गोष्ठियां आयोजित की जाएं तो उसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। मुख्यमंत्री ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि गत वर्ष ‘विकसित कृषि अभियान’ और ‘खेती की बात, खेत में’ कार्यक्रम के दौरान उन्हें कई जनपदों में जाने का अवसर मिला, जहां किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि शिक्षा से जुड़े प्रशिक्षुओं में अभूतपूर्व उत्साह व जिज्ञासा देखने को मिली। पहली बार इनोवेशन को सीधे व्यावहारिक धरातल पर उतारने का अवसर मिला है। पहले लैब में होने वाले अनुसंधान को लैंड तक पहुंचने में काफी समय लगता था, लेकिन अब “लैब टू लैंड” की अवधारणा साकार हो चुकी है और तकनीक सीधे खेत तक पहुंच रही है। इस अभिनव पहल के लिए मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने इस अवधारणा को व्यवहारिक रूप से देशभर में लागू करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।
योजनाओं की सही जानकारी मिले तो किसान स्वयं बेहतर परिणाम देने में सक्षम
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश के पास कृषि क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, आवश्यकता केवल प्रभावी नेतृत्व की है, जिसकी शुरुआत भारत सरकार के स्तर से होती है और राज्य उसे तेजी से अपनाते हैं। पहले नीतियां केवल औपचारिक आयोजनों तक सीमित रह जाती थीं, लेकिन अब उनके ठोस परिणाम सामने आ रहे हैं। अन्नदाता किसानों को योजनाओं की सही जानकारी दी जाए, तो वे स्वयं बेहतर परिणाम देने में सक्षम हैं। मुख्यमंत्री ने वर्ष 2017 की स्थिति का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय प्रदेश में मात्र 69 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) थे, जो लगभग निष्क्रिय अवस्था में थे और उनके वैज्ञानिक भी अन्य संस्थानों में अटैच थे। इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा 20 नए केवीके की पहल के साथ-साथ मौजूदा केंद्रों को सशक्त बनाने की कार्ययोजना पर काम हुआ। आज स्थिति यह है कि सभी केवीके सक्रिय होकर नवाचारों को बढ़ावा दे रहे हैं और प्रदेश के सभी 9 एग्रो-क्लाइमेटिक जोन में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से कृषि विकास को नई दिशा दे रहे हैं।
अब कृषि को वैल्यू एडिशन के साथ जोड़ने की आवश्यकता
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज ये वैज्ञानिक स्थानीय स्तर पर डेमोंस्ट्रेशन करते हैं और फिर किसानों के खेत में जाकर उसे लागू करते हैं, लगातार दौरे करते हैं, निरंतर गोष्ठियां चलती हैं और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साथ ही भारत सरकार के साथ उनका सतत संवाद बना रहता है। इसी का परिणाम है कि उत्तर प्रदेश की कृषि विकास दर 8 से बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है। परिणाम बताते हैं कि हम इससे भी बेहतर उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। सीएम ने कहा कि मेरा मानना है कि आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान लगभग 41-42 प्रतिशत था। समय के साथ इसका योगदान घटता गया। यदि कृषि व मैन्युफैक्चरिंग के बीच बेहतर समन्वय हो, तो विकास की गति और तेज हो सकती है। वर्तमान में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान अब भी लगभग 15–16 प्रतिशत के आसपास है, जबकि कृषि का हिस्सा घटकर लगभग 20–21 प्रतिशत तक सीमित रह गया। अब आवश्यकता है कि कृषि को वैल्यू एडिशन के साथ जोड़ा जाए। इसके लिए नए प्रयासों को और अधिक मजबूती से आगे बढ़ाने तथा प्रभावी ढंग से विस्तार देने की आवश्यकता है।
निर्णायक भूमिका निभा सकती है तकनीक
मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीक आज के दौर में अत्यंत निर्णायक भूमिका निभा सकती है। उन्होंने भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में विभिन्न उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र स्थापित करवाए हैं। उदाहरण के तौर पर, वाराणसी में इंटरनेशनल राइस इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई है, जो बेहतरीन परिणाम दे रहा है। यहां से नई-नई किस्में विकसित की गई हैं। अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक जोन के अनुसार कौन-सी किस्म उपयुक्त होगी, कौन-सी तकनीक अपनाई जानी चाहिए, क्वालिटी सीड किस प्रकार उत्पादन बढ़ा सकते हैं, ये सभी परिणाम अब स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने प्रसन्नता जताई कि कुछ क्षेत्रों में प्रति हेक्टेयर धान का उत्पादन 100 कुंतल तक पहुंच गया है, जो पहले 50–60 कुंतल तक सीमित था। मुख्यमंत्री ने कहा कि अल नीनो के कारण गेहूं और उद्यान फसलों, विशेष रूप से आम पर प्रभाव पड़ा है, लेकिन यह एक सतत चुनौती है। इसके बावजूद, लागत कम करके उत्पादन बढ़ाना, समय पर अच्छे बीज उपलब्ध कराना, केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड के उपयोग को कम करते हुए नेचुरल फार्मिंग को बढ़ावा देना, इन सभी क्षेत्रों में निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
उत्तर प्रदेश में कृषि के लिए अनुकूल वातावरण
मुख्यमंत्री ने बाराबंकी के प्रगतिशील किसान पद्म पुरस्कार से सम्मानित रामशरण वर्मा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि गत वर्ष मुझे उनके खेत पर ‘विकसित कृषि अभियान’ के तहत जाने का अवसर मिला। यदि कोई रामशरण वर्मा से उनकी शैक्षिक योग्यता पूछता है, तो वह स्वयं को “दसवीं फेल” बताते हैं, लेकिन खेती में उनकी दक्षता और वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग अत्यंत प्रेरणादायक है। वह कम लागत में अधिक उत्पादन करने का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। सीएम ने कहा कि उत्तर प्रदेश में भारत सरकार की योजनाओं का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। मुझे विभिन्न जनपदों के खेतों में जाने का अवसर मिला, देखा कि जहां पहले किसान वर्ष में केवल एक फसल लेते थे, अब वहां तीन-तीन फसलें ली जा रही हैं। उत्तर प्रदेश की 85-86 प्रतिशत भूमि सिंचित है, बेहतर कनेक्टिविटी है और किसानों को 10-12 घंटे बिजली उपलब्ध हो रही है। इन सब कारणों से कृषि के लिए अनुकूल वातावरण बना है। पहले किसानों को मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था, लेकिन अब उन्हें जानकारी, संसाधन और बाजार तीनों उपलब्ध हैं। परिणामस्वरूप, उन्होंने नई फसलें अपनानी शुरू की हैं। कानपुर देहात, औरैया, इटावा, मैनपुरी, हरदोई और एटा जैसे जनपदों में मैंने किसानों से बातचीत की। उन्होंने बताया कि वे लोग अब तीन-तीन फसलें तैयार कर रहे हैं। जून माह में भी मक्का की फसल तैयार हो रही थी और किसान प्रति एकड़ लगभग ₹1 लाख मुनाफा कमा रहे थे।
किसानों को मिल रहा उपज का उचित मूल्य
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा बीज उपलब्ध कराना, जानकारी देना और खरीद केंद्र स्थापित करना, इन सभी प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया है। किसानों को अब अपनी उपज का उचित मूल्य मिल रहा है और उनमें विश्वास बढ़ा है कि थोड़े प्रयास से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। आज उत्तर प्रदेश कृषि उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 425 लाख मीट्रिक टन गेहूं, 211 लाख मीट्रिक टन चावल और 245 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन हो रहा है। इसके अतिरिक्त, तिलहन उत्पादन में भी लगभग 48 लाख मीट्रिक टन का स्तर प्राप्त किया गया है। सब्जी और अन्य फसलों के उत्पादन में भी उत्तर प्रदेश ने महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के आगरा में इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर को स्वीकृति प्रदान की है, जो अब प्रारंभ होने जा रहा है। यह पूरा क्षेत्र आलू उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है। यहां किसान दो फसलों के साथ-साथ आलू का भी व्यापक स्तर पर उत्पादन करते हैं और बेहतर परिणाम प्राप्त करते हैं। अब प्रयास यह है कि इस उत्पादन को वैल्यू एडिशन के साथ जोड़ा जाए, ताकि मांग के अनुसार आपूर्ति में हमारे अन्नदाता किसान सहभागी बन सकें। इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर स्थापित होने के बाद सेंट्रल यूपी के विभिन्न जनपदों में फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना तेजी से होगी। यह स्पष्ट संकेत है कि अब किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के माध्यम से मिलना प्रारंभ होगा। इसके साथ ही, कृषि से संबंधित क्षेत्रीय सम्मेलन अलग-अलग एग्रो-क्लाइमेटिक जोन में आयोजित किए जा रहे हैं, जहां स्वयं भारत सरकार के कृषि मंत्री और अधिकारी पहुंच रहे हैं। पहले यह प्रक्रिया केवल दिल्ली में एक औपचारिक एक दिवसीय सम्मेलन तक सीमित रहती थी, लेकिन अब अलग-अलग जोन में वहां की परिस्थितियों के अनुरूप मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो रही है।
इस अवसर पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, कृषि मंत्री उत्तर प्रदेश सूर्य प्रताप शाही, उद्यान मंत्री उत्तर प्रदेश दिनेश प्रताप सिंह, कृषि राज्यमंत्री उत्तर प्रदेश बलदेव सिंह औलख, उद्यान मंत्री हिमाचल प्रदेश जगत सिंह नेगी, कृषि मंत्री जम्मू-कश्मीर जावेद अहमद डार, उद्यान मंत्री पंजाब मोहिंदर भगत, कृषि मंत्री पंजाब गुरमीत सिंह, कृषि मंत्री उत्तराखंड गणेश जोशी उपस्थिति रहे।





